
इनके अलावा कई जाने माने नेता ऐसे हैं जिन्हें नेतृत्व ने अकारण घर बिठा दिया है या घर बैठने को मजबूर कर दिया। वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी हों या नेहरू गांधी परिवार के वफादार सुरेश पचौरी या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से पार्टी संगठन में सचिव पद तक पहुंचे जमीनी नेता हरिकेश बहादुर हों या कभी संजय गांधी और राजीव गांधी की टीम के और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण सिंह मुन्ना हो या फिर पार्टी छोड़ने को मजबूर कर दिए गए पूर्व महासचिव सत्यव्रत चतुर्वेदी, पार्टी इन्हें करीब-करीब भूल चुकी है और इनकी योग्यता, क्षमता और अनुभव का कोई लाभ नहीं ले रही है।
अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो प्रियंका गांधी के कार्यभार संभालने और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद अजय कुमार लल्लू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तो उनकी नियुक्ति को लेकर महज एक बैठक करने वाले रामकृष्ण द्विवेदी, सत्यदेव त्रिपाठी, भूधर नारायण मिश्र, डा. संतोष कुमार सिंह, नेकचंद पांडे जैसे करीब एक दर्जन से ज्यादा उन पुराने निष्ठावान कांग्रेसियों को पार्टी से बाहर कर दिया गया जो लगातार प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने की वकालत करते नहीं थकते थे। काफी समझाने बुझाने के बाद किसी तरह बुजुर्ग रामकृष्ण द्विवेदी की पार्टी में वापसी तो हो गई लेकिन उसके कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। बाकी नेता आज भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी का सपना संजोए पार्टी से बाहर बैठे हैं।
जो कांग्रेस छोड़कर जा चुके हैं, उनके अलावा कई ऐसे भी हैं जो मौके की तलाश में हैं या अभी असमंजस में हैं। सचिन पायलट हालांकि बार-बार यह कहते रहे हैं कि वह भाजपा में नहीं जाएंगे, लेकिन जब वह अपनी बगावत खत्म करके वापस आए थे तब उनसे जो वादे नेतृत्व ने किए थे उनमें से एक भी अभी तक पूरा न होने की वजह से उनके और उनके समर्थकों के मन में भी क्षोभ है और यह क्षोभ कब विद्रोह में बदल जाए कोई नहीं बता सकता। मिलिंद देवड़ा, संजय निरूपम, संजय झा, संदीप दीक्षित जैसे कई नाम इस श्रेणी के हैं।
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