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Monday, November 22, 2021

लिंगायत संप्रदाय हिंदू हैं या नहीं: घर वापसी अभियान के बहाने लिंगायतों को हिंदू बताने का विरोध, आरोप-यह एक ... - दैनिक भास्कर

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बेंगलुरु3 घंटे पहले

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कर्नाटक में धर्मांतरण पर नकेल कसने की तैयारी शुरू हो चुकी है। राज्य में एक तरफ जहां भाजपा सरकार धर्मांतरण के खिलाफ कानून लाने की तैयारी में है। वहीं दूसरी ओर वीरशैव लिंगायत समुदाय ने घर वापसी अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। वहीं, इसी समुदाय के एक अन्य वर्ग का दावा है कि हिन्दू धर्म बताने के लिए ये एक साजिश का हिस्सा है।

समुदाय की निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्था अखिल भारत वीरशैव महासभा ने इस अभियान को शुरू करने का निर्णय लिया है। बता दें कि राज्य के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई समेत 56 विधायक इसी समुदाय से आते हैं। इससे पहले के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से संबंध रखते हैं।

घर वापसी अभियान का समुदाय के एक वर्ग द्वारा विरोध भी जताया जा रहा है। जगतिका लिंगायत महासभा के महासचिव जीबी पाटिल ने कहा, 'वीरशैव महासभा का निर्णय कई सवाल उठाता है और यह ऐसे समय में आया है जब हम लिंगायत धर्म आंदोलन को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। वे इसका इस्तेमाल यह दावा करने के लिए कर सकते हैं कि लिंगायत हिंदू धर्म का अभिन्न अंग हैं, लेकिन यह सच नहीं है।'

अखिल भारत वीरशैव महासभा का दावा है कि राज्य की 6.5 करोड़ की आबादी में लिंगायत 24% हैं। एचके कंथाराजू आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक ये 10% हैं।

अखिल भारत वीरशैव महासभा का दावा है कि राज्य की 6.5 करोड़ की आबादी में लिंगायत 24% हैं। एचके कंथाराजू आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक ये 10% हैं।

इसलिए धर्मांतरण अभियान पर गंभीर लिंगायत समुदाय
धर्मांतरण के खिलाफ घर वापसी अभियान शुरू करने के पीछे बड़ी वजह समुदाय की जनसंख्या को लेकर उठते सवाल हैं। दरअसल, लिंगायत कर्नाटक में मजबूत तो हैं, लेकिन उनकी आबादी के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

जबकि अखिल भारत वीरशैव महासभा का दावा है कि राज्य की 6.5 करोड़ की आबादी में लिंगायत 24% हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, एचके कंथाराजू आयोग की रिपोर्ट के लीक हुए आंकड़ों के मुताबिक लिंगायत कुल आबादी के लगभग 10% हैं।

राज्य के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई समेत 56 विधायक इसी समुदाय से आते हैं। इससे पहले के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से संबंध रखते हैं।

राज्य के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई समेत 56 विधायक इसी समुदाय से आते हैं। इससे पहले के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से संबंध रखते हैं।

धर्मांतरण के पीछे गरीबी
महासभा के उपाध्यक्ष बीएस सच्चिदानंद मूर्ति ने कहा कि यह कुछ लोगों को आश्चर्यचकित कर सकता है, लेकिन यह एक सच्चाई है कि वीरशैव-लिंगायत समुदाय का एक वर्ग धर्म परिवर्तन के प्रलोभन के प्रति संवेदनशील होता जा रहा है। मूर्ति ने आगे बताया कि एक बड़ा वर्ग गरीबी से त्रस्त है। धर्मांतरण में लिप्त लोगों द्वारा इसका फायदा उठाया जा रहा है।

मूर्ति ने एक रिपोर्ट के हवाले से दावा किया कि दावणगेरे, धारवाड़, गडग, चामराजनगर, मैसूर, कोप्पला और रायचूर सहित कई जिलों में लगभग एक लाख लिंगायत ईसाई धर्म अपना चुके हैं। हालांकि, उन्होंनें इन आंकड़ों को लेकर कोई ठोस आधार नहीं बताया। उन्होंने कहा कि 'घर वापसी' अभियान का उद्देश्य इन लोगों को वापस अपने धर्म के नजदीक लाना है।

महासभा के प्रतिनिधियों ने कहा कि घर वापसी के मुद्दे पर 23 दिसंबर को अपनी अगली बैठक के दौरान चर्चा की जाएगी।

महासभा के प्रतिनिधियों ने कहा कि घर वापसी के मुद्दे पर 23 दिसंबर को अपनी अगली बैठक के दौरान चर्चा की जाएगी।

महासभा ने जारी किया सर्कुलर
अखिल भारत वीरशैव महासभा ने राज्य भर में फैले अपनी जिला और तालुका इकाइयों को एक सर्कुलर जारी किया है, जिसमें अन्य धर्मों में जाने वाले लिंगायतों का पता लगाने के लिए घरों का सर्वे करने का निर्देश दिया गया है। इसने स्थानीय इकाइयों को स्थानीय मठों की मदद से 'पुनर्परिवर्तन' कार्यक्रम आयोजित करने के लिए भी कहा है।

महासभा के प्रतिनिधियों ने कहा कि इस मुद्दे पर 23 दिसंबर को अपनी अगली बैठक के दौरान चर्चा की जाएगी। महासभा के अध्यक्ष शमनूर शिवशंकरप्पा ने कहा- हम जिलों से डेटा इकट्‌ठा करेंगे और फिर अभियान के तौर-तरीकों पर फैसला करेंगे।

भाजपा ने कहा-धर्मांतरण के पीछे मिशनरीज
भाजपा के विधायकों का कहना है कि ईसाई मिशनरी धर्मांतरण में शामिल हैं और विशेष रूप से दलितों सहित आर्थिक रूप से गरीब पृष्ठभूमि के लोगों को टारगेट कर रहे हैं। होसदुर्गा विधायक गूलीहट्टी शेखर ने हाल ही में विधायिका समिति के साथ इस मुद्दे को उठाया और कथित रूप से शामिल अनधिकृत चर्चों का सर्वेक्षण सुनिश्चित किया।

कर्नाटक में 100 विधानसभा सीटों पर लिंगायत समुदाय का वर्चस्व है।

कर्नाटक में 100 विधानसभा सीटों पर लिंगायत समुदाय का वर्चस्व है।

लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व
साल 1956 में भाषाई आधार पर बने कर्नाटक को मठों का राज्य कहा जाता है। पूरे प्रदेश में 500 से भी अधिक मठ हैं जिनमें से अधिकांश लिंगायत हैं, जबकि दूसरे नंबर पर वोक्कालिगा समुदाय के मठ हैं। हर चुनाव के वक्त इन मठों का प्रभाव बढ़ जाता है। राज्य में लिंगायत मठ बहुत शक्तिशाली हैं और सीधे राजनीति में शामिल हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दोनों समुदाय के बिना कर्नाटक की राजनीति अधूरी है।

100 सीटों पर लिंगायत समुदाय का वर्चस्व
आबादी के लिहाज से लिंगायत 17% और वोक्कालिगा 15% हैं लेकिन वे सरकार बनाने या फिर उसे गिराने की भी ताकत रखते हैं। लिंगायत तटीय इलाकों को छोड़कर राज्यभर में फैले हैं और विधानसभा की 224 सीटों में से तकरीबन सौ सीटों पर इनका प्रभाव है, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इनकी नाराजगी मोल लेने से अक्सर बचता ही रह है। जबकि वोक्कालिगा समुदाय का वर्चस्व दक्षिणी कर्नाटक में है।

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